पूरी तरह घिर गए लगते हैं अरविंद केजरीवाल

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जैसे ही अहिंसावादी अन्ना हजारे ने कहा कि उनका और अरविंद केजरीवाल का अब कोई लेना-देना नहीं है और वो केजरीवाल की पार्टी का साथ नहीं दे रहे हैं उसके बाद से तो लोगों की प्रतिक्रियाओं का ऐसा दौर शुरू हो गया है जो थामे नहीं थम रहा है। सोशल नेटवर्किंग साइट्स फेसबुक पर तो लोगों ने सीधे तौर अरविंद केजरीवाल पर हमला बोल दिया है। अन्ना हजारे औऱ अरविंद केजरीवाल अलग-अलग क्या हुए, लोगों ने तरह-तरह की बाते शुरू कर दी हैं। नेताओं की छोड़िये, इंडिया अगेंस्टक करप्शुन से जुड़ने वाले लोगों की नजर में भी यही है कि जो हुआ अच्छा नहीं हुआ है, जिसके लिए दोषी केवल अरविंद केजरीवाल को ही ठहराया जा रहा है।
अन्ना आंदोलन के कार्यकर्ता अधिवक्ता नवीन चौधरी ने अपने फेसबुक वॉल पर लिखा है कि अरविंद केजरीवाल ने अन्ना हजारे का इस्तेमाल किया है। अरविंद केजरीवाल जरूरत से ज्यादा बुद्दिमान हैं, उन्हें जो हासिल करना था वो उन्होंने हासिल कर लिया है। अन्ना के आंदोलन के पहले केजरीवाल को कोई नहीं जानता था। आज वो कुछ भी बोलते हैं वो हेडलाइन बन जाती है। आज केजरीवाल को देश का बच्चा-बच्चा जानता है इसलिए उन्हें भी राजनीति का चस्का लग गया है, वो भी अपनी जेबें गर्म करना चाहते हैं, लेकिन शायद वो भूल गये हैं कि बिना अन्ना के वो कुछ नहीं है, यह बात आम जनता भी जानती हैं जो कि उनका यह सपना पूरा नहीं होने देगी।
नवीन चौधरी पिछले २० सालों से दिल्ली के जिला कोर्ट में वकालत कर रहे हैं और पिछले पांच सालों से वो अन्ना के आंदोलन में सक्रिय कार्यकर्ता के रूप में काम कर रहे हैं। बकौल नवीन अन्ना एक सीधे और सरल इंसान हैं, वो केजरीवाल की राजनीतिक महात्वाकांक्षा को समझ नहीं पाये इसलिए उन्हें इतना अपने करीब आने दिया। टीम अन्ना के भंग होने से नवीन काफी आहत हैं उन्होंने कहा कि उन्हें भी लगने लगा है कि अन्ना का आंदोलन भटक गया है और बेकार हो गया है।
इंडिया अगेंस्टा करप्शनन से जुड़ी जज प्रीति गर्ग से जब हमने बात की तो उनका गु्स्सा एकदम से उबल पड़ा, उन्होंने कहा केजरीवाल के अंदर भी लालच आ गया है, वो लालची बन गये हैं उन्हें भी राजनीति का आकर्षण भा गया है इसलिए ही अन्ना उनसे अलग हो गये।
वहीं अन्ना आंदोलन के कार्यकर्ता स्टेट बैंक वाराणसी के ब्रांच मैनेजर सुशील कुमार सिंह ने अपने फेसबुक वॉल पर लिखा है कि अरविंद केजरीवाल जरूरत से ज्यादा बुद्दिमान हैं, उन्हें जो हासिल करना था वो उन्होंने हासिल कर लिया है। अन्ना के आंदोलन के पहले केजरीवाल को कोई नहीं जानता था। आज वो कुछ भी बोलते हैं वो हेडलाइन बन जाती है। आज केजरीवाल को देश का बच्चा-बच्चा जानता है इसलिए उन्हें भी राजनीति का चस्का लग गया है, वो भी अपनी जेबें गर्म करना चाहते हैं, लेकिन शायद वो भूल गये हैं कि बिना अन्ना के वो कुछ नहीं है, यह बात आम जनता भी जानती हैं जो कि उनका यह सपना पूरा नहीं होने देगी।
गौरतलब है कि राजनीतिक पार्टी के खिलाफ रहे अन्ना हजारे ने बुधवार को ऐलान किया था कि वो केजरीवाल के साथ कोई पार्टी नहीं बना रहे हैं । उन्होंने साफ तौर पर केजरीवाल को हिदायत दी है कि वो अपने कैंपेन के दौरान उनकी न तो तस्वीरों का इस्तेमाल करें और न ही उनके किसी बयान का।
भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के दौरान जुटी रकम को अन्ना हजारे वापस नहीं लेंगे। यह रकम अरविंद केजरीवाल के पास है। उन्होंने इसे अन्ना को देने की पेशकश भी की है, लेकिन हजारे ने मना कर दिया है। यह राशि करीब दो करोड़ रुपए की बताई जा रही है।
अन्ना ने पिछले दिनों हुई बैठक में अपने समर्थकों को बताया था कि केजरीवाल ने उन्हें राशि लौटाने की पेशकश की थी, लेकिन उन्होंने इससे इनकार कर दिया। मीटिंग में मौजूद लोगों के मुताबिक, अन्ना ने केजरीवाल से कहा था कि वे पैसे अपने पास रखें। अन्ना ने १९ सितंबर को एक मीटिंग के बाद घोषणा की थी कि अब केजरीवाल और उनके रास्ते अलग हैं। इसके अगले दिन दिल्ली के महाराष्ट्र सदन में अन्ना समर्थकों की एक बैठक हुई। इसमें रकम के मसले पर चर्चा हुई थी। हालांकि अन्ना समर्थकों के एक वर्ग की राय है कि आंदोलन चलाने के लिए उन्हें धन की जरूरत होगी। लिहाजा केजरीवाल से पैसे वापस ले लेने चाहिए। लेकिन हजारे का कहना है कि धन का मुद्दा इस लड़ाई का बिंदु नहीं होना चाहिए।
अरविंद केजरीवाल कहते हैं, ‘कुछ लोग कहते हैं कि अन्ना हमसे अलग हो गए हैं। मगर वे हमारे दिलों में हैं। उन्हें हमसे दूर कोई नहीं कर सकता।’ उन्होंने कहा, ‘हममें ऐसा कोई बड़ा मतभेद नहीं है। यह तो बस इतना है कि वे मानते हैं कि राजनीति गंदी है। हम सोचते हैं कि राजनीति की गंदगी को साफ करने के लिए हमें इसमें आना ही होगा। यदि हम ईमानदारी से काम करते रहे तो तीन चार माह बाद अन्ना हमारे साथ लौट आएंगे।’
केजरीवाल ने ३०० कार्यकर्ताओं के साथ जंतर-मंतर परदिल्ली सरकार के खिलाफ प्रदर्शन किया। मांग थी बिजली की दरों में बढ़ोतरी वापस लेने की। केजरीवाल ने कहा, ‘बिजली का शुल्क दोगुना हो गयाहै। जहां पहले लोग २०० यूनिट बिजली की खपत के लिए ५०० रुपए देते थे। अब १,००० रुपए देने पड़ रहे हैं। ‘
अरविंद केजरीवाल आंदोलन के दिमाग थे। अब यह भूमिका किरण बेदी या किसी और को निभानी होगी। जनता के जुड़ाव को कायम रखने एवं आंदोलन के लिए पैसे जुटाने का काम नए सिरे से करना होगा। बाबा रामदेव की भूमिका निर्णायक। अन्ना को यह साबित करना होगा कि आंदोलन पर संघ का प्रभाव नहीं है। जनलोकपाल को लेकर आंदोलन को गति देने की जरूरत।
मगर बीच रास्ते में आंदोलन छोडऩे से विश्वास घटा। दोबारा वैसा ही भरोसा हासिल करना मुश्किल होगा। अन्ना चेहरा थे। वे अब साथ नहीं है। लोगों का भरोसा बनाए रखने के लिए खुदही चेहरा बनना होगा। साबित करना होगा कि राजनीति मेंआने का फैसला सही था।:जनलोकपाल की जरूरत को उनके दिमाग में जिंदा रखना होगा। अलग-अलग जन आंदोलनों को अपनेसाथ जोडऩा होगा। लेकिन, राजनीतिक महत्वाकांक्षी होने के आरोपों को दूर करने की चुनौती होगी।
सरकार ने नजरअंदाज करना शुरू करदिया है। यानी मांगों पर नहीं झुकेगी।:दो धड़ों में बंटे आंदोलन का लक्ष्य एक है। समानांतर रूप से चलता रहेगा। लेकिन… लोकपाल के आंदोलन का जो माहौल बना था, वैसा निकट भविष्य में संभव नहीं लगता।
बिखराव के पीछे संघ, साथी या स्वयं अन्ना? भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन का चेहरा अन्ना हजारे थे तो दिमाग अरविंद केजरीवाल। दो अगस्त को अन्ना हजारे ने खुद राजनीतिक विकल्प देने का ऐलान किया था। लेकिन अब अन्ना राजनीति से दूर रहने की बात कर रहे हैं। सिलसिलेवार कडिय़ां जोड़ें तो सही तस्वीर सामने आएगी।
पहली बार अन्ना के बिना आंदोलन हुआ। अरविंद (अरविंद केजरीवाल से उम्मीमदों और नाउम्मी्दी के ९ कारण, पढ़ें) भूख हड़ताल पर बैठे। लेकिन भीड़ नहीं थी। २ अगस्त आते-आते अन्ना मंच पर लौटे और भीड़ भी। वरिष्ठ नागरिकों के पत्र पर अनशन टूटा। अन्ना बोले, बहुत हुआ आंदोलन। अब और नहीं। राजनीतिक विकल्प देने का वक्त आ गया है। लोगों से राय मांगेंगे। पार्टी का ऐलान २ अक्टूबर को होगा। यह तय हुआ। बैठक में किरण बेदी भी थीं। इस बीच केजरीवाल ने प्रधानमंत्री,कांग्रेस अध्यक्ष और भाजपा अध्यक्ष का घेराव करने की घोषणा की। किरण बेदी बिदक गईं। कहा- ‘भाजपा पर हमले करनेकी जरूरत नहीं है।’
आरोप लगे कि बेदी को भाजपा दिल्ली का मुख्यमंत्री बनाना चाहती है। बेदी मुकरती रहीं। घेराव से दूर रहीं। बोलीं, बिखर गई है टीम। इस बीच उम्मीदवारों के लिए शर्तें तय हुईं। अन्ना से केजरीवाल ने हामी भी भरवाई। मीडिया को बताया कि सभी को शपथ पत्र देना होगा कि जीते तो लाल बत्ती नहीं लगाएंगे। सुरक्षाकर्मी, बंगला नहीं लेंगे।…लेकिन अन्ना ने आंदोलन का पता ही बदल दिया। ब्लॉग में लिखा कि मुझे राजनीतिक दलों पर भरोसा नहीं है। मेरा आंदोलन जारी रहेगा। समर्थकों से मुलाकात की। १९ सितंबर को कहा, मैं केजरीवाल के सभी उम्मीदवारों को समर्थन नहीं दूंगा।
इसी दिन रात को अन्ना ने दिल्ली में बाबा रामदेव से मुलाकात की। मीडिया से खुलकर बात करने वाले अन्ना भी सवालों से बचते दिखे। मीडिया ने दावा किया कि अन्ना-केजरीवाल में फूट संघ ने डाली। संघ प्रवक्ता राम माधव को यह जिम्मा सौंपा गया था। सीताराम जिंदल कई बार हजारे से मिलने उनके गांव गए। अब तो आंदोलन ही अंधे का हाथी हो गया है। राजनेता मजे से चल रहे घटनाक्रम को देख रहे हैं। जिन्हें आंदोलन से उम्मीद थी, वे ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं।

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2 thoughts on “पूरी तरह घिर गए लगते हैं अरविंद केजरीवाल

  1. Aap ulta sidha hi likh sakte ho aapke bas ki bat nahi arvind ko pahachanana.

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